Monday, 6 April 2026

गौरव के क्षण

संस्था की सदस्या डॉ. प्रगति जैन को गौरव प्राप्त हुआ। उन्हें बहुत बहुत बधाई।
शुभकामनाएँ - वे इसी प्रकार नये नये प्रतिमान और कीर्तिमान स्थापित करें।
👏👏👏

Sunday, 15 March 2026

लोकार्पण समाचार व्रजेन्द्र नागर

दिनांक १४ मार्च २८

कार्यक्रम :- लोकार्पण समारोह
पुस्तक:- राम वनवास ?
लेखक :- व्रजेन्द्र नागर
प्रकाशक:- श्रीविनायक प्रकाशन, इन्दौर
वर्ष २०२६

मुख्य अतिथि :- डॉ. जी.डी. अग्रवाल
संस्था अध्यक्ष :- रवीन्द्र नारायण पहलवान
चर्चाकार :- रामनारायण सोनी
सूत्रधार :- मुकेश इन्दौरी

🌹💐🌹💐🌹💐🌹💐

पुस्तक–चर्चा : राम को वनवास ?
1. साहित्यिक दृष्टि से

राम को वनवास ? पौराणिक आधार पर लिखी गई ऐसी कृति है जिसमें रामकथा के एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रसंग को केंद्र में रखकर उसे व्याख्यात्मक और चिंतनात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है। राम के वनवास का प्रसंग भारतीय साहित्य और संस्कृति में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसमें त्याग, मर्यादा, कर्तव्य और धर्म के आदर्शों का अत्यंत प्रभावशाली रूप दिखाई देता है। लेखक ने इसी प्रसंग को आधार बनाकर न केवल कथा का वर्णन किया है, बल्कि उसके पीछे निहित सांस्कृतिक और मानवीय अर्थों को भी स्पष्ट करने का प्रयास किया है।
साहित्यिक दृष्टि से इस कृति की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें कथा और विचार का संतुलित समन्वय दिखाई देता है। लेखक केवल घटनाओं का क्रम प्रस्तुत करने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि प्रत्येक प्रसंग के साथ उसके निहितार्थों को भी स्पष्ट करते हैं। इस कारण यह कृति केवल कथा-साहित्य नहीं रह जाती, बल्कि विचारप्रधान साहित्य के रूप में भी सामने आती है।
कृति में राम का वनवास केवल एक पारिवारिक या राजकीय घटना नहीं है, बल्कि वह जीवन-मूल्यों की परीक्षा का प्रतीक बन जाता है। जब राम पिता के वचन की रक्षा के लिए वन जाने का निर्णय लेते हैं, तब यह प्रसंग भारतीय संस्कृति के उस आदर्श को उजागर करता है जिसमें सत्य, धर्म और कर्तव्य को सर्वोपरि माना गया है। इस प्रसंग के माध्यम से लेखक यह संकेत करता है कि महानता का आधार सत्ता या वैभव नहीं, बल्कि चरित्र और मर्यादा होती है।
भाषा की दृष्टि से यह कृति सरल, सहज और प्रवाहपूर्ण है। लेखक ने सामान्य हिन्दी का प्रयोग किया है, जिससे विषय व्यापक पाठक वर्ग के लिए सुलभ हो जाता है। कहीं-कहीं पौराणिक प्रसंगों और सांस्कृतिक संकेतों का प्रयोग भाषा को साहित्यिक गरिमा भी प्रदान करता है। भाषा में अनावश्यक अलंकरण नहीं है, बल्कि स्पष्टता और विचार की गंभीरता पर अधिक बल दिया गया है।
वर्णन की दृष्टि से भी यह कृति प्रभावपूर्ण है। लेखक ने वनवास के प्रसंग के साथ-साथ उस समय के भूगोल, वन क्षेत्र और जनजीवन का भी उल्लेख किया है। दण्डकारण्य और वहाँ निवास करने वाले वनवासी समाज का उल्लेख यह संकेत देता है कि रामकथा केवल राजमहलों की कथा नहीं है, बल्कि वह व्यापक जनजीवन से भी जुड़ी हुई है। इससे कृति का साहित्यिक और सांस्कृतिक विस्तार और अधिक व्यापक हो जाता है।
इस प्रकार साहित्यिक दृष्टि से राम को वनवास ?एक ऐसी कृति है जिसमें कथा, विचार और सांस्कृतिक व्याख्या का संतुलित रूप दिखाई देता है। यह कृति पाठक को केवल कथा का आनंद ही नहीं देती, बल्कि उसे जीवन-मूल्यों पर विचार करने के लिए भी प्रेरित करती है।

2. सामाजिक और समसामयिक संदर्भ में उपयोगिता की दृष्टि से
यह कृति केवल पौराणिक प्रसंग का वर्णन करने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उसके माध्यम से समाज के लिए अनेक महत्वपूर्ण संकेत भी प्रस्तुत करती है। राम का वनवास त्याग, कर्तव्य और मर्यादा का प्रतीक है। यह प्रसंग यह दर्शाता है कि जीवन में नैतिक मूल्यों का पालन ही मनुष्य को महान बनाता है। आज के समय में, जब समाज अनेक प्रकार के नैतिक और सामाजिक संकटों से गुजर रहा है, तब इस प्रकार की कृतियाँ जीवन के मूल्यों की पुनर्स्मृति कराती हैं।
सामाजिक दृष्टि से भी यह कृति अत्यंत महत्वपूर्ण है। राम और निषादराज के संबंध का उल्लेख सामाजिक समरसता का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह विचार आज के समाज में विशेष रूप से प्रासंगिक है, जहाँ समानता और सामाजिक न्याय की आवश्यकता लगातार अनुभव की जा रही है।
कृति में वनवासी समाज का उल्लेख भी सामाजिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय संस्कृति केवल नगरों और राजमहलों तक सीमित नहीं थी, बल्कि वन और जनजातीय समाज भी उसका अभिन्न अंग थे। राम का वनवास इन समाजों के साथ एक प्रकार के सांस्कृतिक संवाद के रूप में भी देखा जा सकता है। यदि समाज में समानता, सहिष्णुता और पारस्परिक सम्मान की भावना विकसित होती है, तो वह अधिक सुदृढ़ और स्थायी बन सकता है।

लेखक ने इस भाव को अत्यंत सार्थक रूप में व्यक्त किया है—
“पिता का वचन ही मेरे लिए धर्म है; उसका पालन करना ही मेरे जीवन का कर्तव्य है।”
राम का यह निर्णय केवल पुत्रधर्म का पालन नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे आदर्श का प्रतीक बन जाता है जिसमें व्यक्ति अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर मर्यादा का पालन करता है। इस प्रसंग के माध्यम से लेखक यह संकेत करता है कि सच्चे आदर्श वही होते हैं जो कठिन परिस्थितियों में भी अडिग रहते हैं।
इस कृति में सीता का चरित्र भी अत्यंत संवेदनशील और प्रेरक रूप में सामने आता है। जब राम वन जाने का निश्चय करते हैं, तब सीता का उनके साथ चलने का निर्णय नारी के साहस, प्रेम और समर्पण का अद्भुत उदाहरण बन जाता है। सीता के शब्दों में दांपत्य-निष्ठा और जीवन-सहचर्य की भावना स्पष्ट दिखाई देती है—
“जहाँ आप हैं, वहीं मेरा जीवन है; आपके बिना अयोध्या भी मेरे लिए वन के समान है।”
यह प्रसंग भारतीय नारी के उस आदर्श को प्रस्तुत करता है जिसमें प्रेम के साथ-साथ साहस और आत्मसम्मान भी निहित है। 
लक्ष्मण का चरित्र भी इस कृति में अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरक है। लक्ष्मण का अपने भाई के प्रति प्रेम और सेवा-भाव उन्हें एक आदर्श अनुज के रूप में स्थापित करता है। उनके शब्दों में भाई के प्रति समर्पण की भावना स्पष्ट दिखाई देती है—
“भैया, आपका साथ छोड़कर अयोध्या में रहना मेरे लिए संभव नहीं; आपकी सेवा ही मेरा जीवन है।”
इस प्रसंग के माध्यम से लेखक ने पारिवारिक संबंधों की गहराई को अत्यंत प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया है। लक्ष्मण का त्याग यह दर्शाता है कि सच्चा प्रेम केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्तव्य और समर्पण में दिखाई देता है।
पुस्तक में अयोध्या के वातावरण का चित्रण भी अत्यंत मार्मिक है। जब राम के वनवास की खबर फैलती है, तब पूरे नगर में शोक की लहर फैल जाती है। जनता का यह दुख यह दर्शाता है कि राम केवल एक राजकुमार नहीं, बल्कि जन-हृदय के प्रिय आदर्श पुरुष थे। लेखक ने इस भाव को इस प्रकार व्यक्त किया है—
“अयोध्या का प्रत्येक हृदय शोक से भर उठा; मानो नगर की प्रसन्नता ही वन की ओर चली गई हो।”
यह चित्रण इस बात का संकेत देता है कि सच्चा नेतृत्व वही है जो अपने आचरण से जनता का विश्वास और प्रेम प्राप्त करता है।

3. समग्र दृष्टि
समग्र रूप से देखा जाए तो राम को वनवास ? एक विचारप्रधान और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कृति है। इसमें रामकथा के एक प्रमुख प्रसंग को आधार बनाकर भारतीय जीवन-मूल्यों की व्याख्या की गई है। लेखक ने इस प्रसंग के माध्यम से यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि भारतीय संस्कृति में मर्यादा, कर्तव्य और त्याग को अत्यंत उच्च स्थान प्राप्त है।
कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें पौराणिक कथा को केवल धार्मिक आस्था के रूप में नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक अनुभव के रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेखक ने कथा के साथ-साथ उसके सामाजिक और मानवीय अर्थों को भी स्पष्ट किया है। इससे यह कृति केवल कहानी नहीं रह जाती, बल्कि विचार और चिंतन का विषय बन जाती है।
साहित्यिक दृष्टि से यह कृति सरल भाषा, स्पष्ट शैली और विचारपूर्ण प्रस्तुति के कारण प्रभावशाली बनती है। सामाजिक दृष्टि से यह समानता, समरसता और कर्तव्यबोध की भावना को प्रोत्साहित करती है। समसामयिक दृष्टि से यह पाठक को यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि आधुनिक जीवन में नैतिक मूल्यों का स्थान कितना महत्वपूर्ण है।
अंततः कहा जा सकता है कि राम को वनवास ? यह पाठक को केवल अतीत की स्मृति से नहीं जोड़ती, बल्कि उसे वर्तमान जीवन के संदर्भ में भी प्रेरित करती है। इस प्रकार यह कृति साहित्य, समाज और संस्कृति—तीनों दृष्टियों से एक सार्थक और विमर्श के रूप में देखी जा सकती है।

रामनारायण सोनी

Wednesday, 25 February 2026

आज का सृजन २

Vrajendra Nagar 
शुद्ध जल जवाबदार ?
पानी पानी चिल्लाकर पानी उतार 
देते हैं 
स्वच्छता के काम आने वाले को 
अशुद्ध कर देते हैं 
स्वयं ही असावधान है खुद के स्वास्थ्य
 के लिए 
गंदा पानी पीकर, बीमार दूसरों को 
कर देते हैं 
पिपासा बढ़ती है, लालच के कारण 
फिर अन्य बदनाम क्यों
दूध में पानी मिलाकर दूध पीकर खुद 
खुश होते हैं 
इंदौर में पानी गंदा किया किसने है ?
अनजान है 
फिर आम को बदनाम कर पनियाते 
अन्य को हैं 
खुद ही जल स्रोत को दूषित करके 
दूषण फैलाते 
व्यवस्था की बुनियाद को भी तो 
अव्यवस्थित करते 
गंदगी नाले में डाल गंदा नाला बना
कर स्वयं बदनाम करते 
माना कि जल को शुद्ध रखना अपनी
जवाबदारी नहीं है 
शुद्ध जल पीने की जवाबदारी तो खुद
की ही है ना 
जितने जवाबदारी मुहैया कराने वाले 
दोषी हैं उतने ही हम खुद भी हैं
आईने पर धूल जमीं है अतः आइने से 
परहेज करते हैं 
खुद के द्वारा की गई गंदगी का जवाब
गैरों से मांगते 
सुबह-सुबह उठकर अपना मुंह क्या
खुद ही नहीं धोते हैं 

व्रजेंद्र नागर 
251 श्री मंगल नगर इंदौर
,🌤️💐💐
आसमान की ओर उछाला हुआ 
सिर पर आ गिरे 
जवाबदार कौन ?
राही के सिर पर तीसरी मंजिल 
से खपरैल गिरे 
जवाबदार कौन ?
उड़ते परिंदे का पंख फड़फड़ाते
 धागे में उलझे 
जवाबदार कौन ?
उड़ती पतंग से खग तकरा जाए 
पतंग फट जाये 
जवाबदार कौन ? 
हवन करते हुए हाथ जल जाए 
इलाज समय पे ना मिले 
जवाबदार कौन ?
हत्यारा मौन रह कर आंसू बहाते
सजा कोई दूसरा पाये 
जवाबदार कौन ? 
मंथन करने पर हलाहल आ जाए
नवनीत मिल न पाये 
जवाबदार कौन ?
धनवंतरी इलाज करें और यम भी
अपना नियम निभाये
जवाबदार कौन ?
बिल्ली के भाग से छींका टूटे, बिल्ली 
का ही सिर भी फूटे
जवाबदार कौन ?

व्रजेंद्र नागर 
251 श्री मंगल नगर इंदौर

Tuesday, 24 February 2026

आज का सृजन १

आज के सृजन में
   श्री व्रजेन्द्र नागर एवं श्री अखिलेश जैन


 विडम्बना
वनवासी तपते हैं या तपाये
जाते 
प्रकृति से ओत: प्रोत हैं सरल 
प्रताड़े जाते 
मानव स्वभाव है व प्रकृति भी 
है उसकी 
भवन सृजन के पूर्व गड्ढे बहुत 
खोदे जाते 
आधार जीवन का कैसा है नहीं 
जानते 
सिर्फ कंगूरे पर फड़फड़ा कर 
गुटर्गू करते 
आनंद पाने के पूर्व ही उठाते हैं 
जोखिम 
हिम का अंत होने पर ही बाहर 
भी है आती 
बहार की चाहत में भी गर्त व 
शिखर को तलाशते 
गर्मी के मौसम में ठंडक पाने
जल के निकट जाते 
क्रोध करते हैं खुद शांति को पाने 
के लिए 
न जाने क्यों जीवन के लिए मौत 
हैं चाहते 

 सफलता का चरम
सफलता यूं ही नहीं मिलती बीज को
मिट्टी में दबना होता है
अंकुरण के साथ ही विकसित हो लंबी 
प्रतीक्षा करता है
लालिमा से हरितिमा पाकर पल्लवित 
होता है 
समय पाकर गुम्फित भी होता है कली 
का स्पंदन जीवन्त होता है 
विस्तार पाकर सुमन ही सुरभित दुनिया 
करता है 
प्रकृति सुमन पाकर फलवती हो जाती
शिखर जाती है 
साधना और तप से ही फल परिपक्व हो
रस देता है
सफलता पाने के बाद वह न अवरुद्ध
कभी होता है 
बड़ी यातनाएं सहकर ही रस संवर्धन 
करता है 
इस पर भी लोग चखकर अनुभूति ही
बताते हैं 
जैसी प्रकृति है वैसा ही फल मधुरिम या
कटु होता है 
सफलता पाते ही दिल सागर सा उदात्त
लहराता है 
उद्भट और उत्तंग लहरें उठ कर गर्जन
 व तर्जन करती रहती है
सागर सा विशाल हृदय उन्हें शीतल 
कर देता है 
हृदय का उथला पन कभी भीसंरक्षण 
न देता है 

व्रजेंद्र नागर 
251 श्री मंगल नगर इंदौर

[07/12/2025, 1:10 pm] Akhilesh Jain SAI: 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

न कर बयां,
           दर्द उधार का




न पता तुझे 
दर्द है, कहां
न है हर दर्द की 
दवा यहां,

देख भर के 
एक नज़र जहान,
हर शख्स है,
परेशान यहां,

छोड़ दे 
किस्सा हार का,
गा गीत,
बहार का,

किस ने देखा,
वो पल,
जी ले आज,
कौन सा कल?

न कर बयां 
दर्द उधार का 
देख अपना,
छोड़ संसार का,


©अखिलेश जैन "अखिल"

"भारत बने प्रमाण"

सोने वाले जाग जरा,
अरुण किरण ले आग,
स्वप्न देखे जो निंद्रा में 
हो कर्मरत कर साकार,

आराधन कर आराध्य,
कर नित ग्रह,देव याग 
जग को दे,संभव भाग,
अकिंचन न रहे समाज,

आदि से अनंत प्रकृति,
कर सब उचित विचार,
शुभारंभ कर जीवन में
षड रिपु का कर त्याग,

संग संग का कर संगठन
एकजुट हो सब परिवार
संकल्पों संग सुसज्ज हो
कर दनुज शक्ति संहार,

दिव्य बनें अखिल मनुज
हो देवगुण सकल व्याप्त
राज काज धर्म नीति का 
भारत बने सहर्ष प्रमाण

©अखिलेश जैन "अखिल"
८/१२/२०२५

Monday, 16 February 2026

मीटिंग १४ फरवरी २०२६

सोसायटी ऑफ ऑथर्स की साहित्यिक और डिजिटल क्रियेशन पर आधारित विशिष्ठ सभा, दिनांक १४ फरवरी को कुन्द कुन्द ज्ञानपीठ में आयोजित की गई। मुख्य अतिथि डॉ. ज्योति किरण जैन समाजसेवी एवं लेखिका ने उद्बोधन में कहा कि लेखक का मुख्य धर्म है कि वह समाज के जन जन की पीड़ा, दर्द, सुख-दुःख, व्याप्त नैतिक-अनैतिक आचार व्यवहार तथा उसके जीवन में अनुभूत प्रेरक तथा जीवनोपयोगी प्रसंगों को अवश्य लिखें। प्रिन्ट मीडिया के माध्यम से अपनी बात सीमित क्षेत्र तक पहुंचती है। डिजिटल क्रियेशन का महत्व बताते हुए कहा कि वर्तमान में बहुप्रचलित सोशल मीडिया के माध्यम से आपकी बात सभी उम्र के लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुंच सकती है। इसका सदुपयोग करें दुरुपयोग नहीं। संस्था सचिव रामनारायण सोनी ने बताया कि लेखन के परम्परागत स्वरूप के साथ साथ एडवान्स्ड डिजिटल क्रियेशन के विभिन्न आयामों का उपयोग करके लेखन किस तरह शीघ्र छपने एवं सोशल मीडिया के हेतु उपयोग करने लायक तथा प्रभावी बना सकते हैं। संस्था इस हेतु शीघ्र ही निःशुल्क वर्कशाप आयोजित करेगी। जिसमें ब्लॉग लेखन, रिकार्ड कीपिंग, काव्य के पोस्टर मेकिंग, यूट्यूबर, ऑडियो - विजुअल का साहित्य सृजन में उपयोग के विषय शामिल होंगे। लेखन, कविता गायन आदि में ए.आय. के भरपूर उपयोग पर कार्यशाला भी होगी। 
सभा में डॉ. उपेन्द्र धर, भीमसिंह पंवार, अखिलेश जैन, महेन्द्र सांघी, राजेश रामनगीना, विपिन जैन, व्रजेन्द्र नागर, शोभारानी तिवारी, रशीद अहमद शेख, ओमप्रकाश जोशी, बालकराम शाद, डॉ. स्वातिसिंह, रामनारायण सोनी आदि बड़ी संख्या में उपस्थित रचनाकारों ने गीत, गजल का पाठ किया। अध्यक्ष्यीय उद्बोधन रवीन्द्र पहलवान ने दिया। संचालन संस्था सचिव रामनारायण सोनी ने किया। 

रामनारायण सोनी
सचिव

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Monday, 12 January 2026

संस्था का संकल्प पत्र

हमारा संकल्प- पत्र और रोड मेप

१ . प्रतिमाह मासिक सभा का अनिवार्य रूप से आयोजन
२. जन्म, मरण, परण और स्मरण। प्रतिमाह की सभा के प्रथम सत्र में
३. विधायें :- गद्य, पद्य, लघुकथा, लोकगीत आदि
४. भाषा :- हिन्दी, उर्दू, संस्कृत, अंग्रेजी और आंचलिक भाषा-बोली
५. संस्कृति :- प्रत्येक माह में पड़ने वाल पर्वों, त्यौहारों, विश्व दिवस आदि को सांकेतिक, सामूहिक स्वरूप में मनाना।
६. प्रत्येक सदस्य द्वारा मासिक सभा में रचना पाठ
७. नवोदित लेखकों को प्रोत्साहन 
८. सदस्यों की नवीन कृतियों का लोकार्पण कराना
९. साझा संकलन तैयार करना
१०. संस्था में हमने पदाधिकार नहीं पदेन सेवा का दायित्व लिया है। 

सोसायटी ऑफ ऑथर्स की गतिविधियाँ

सोसायटी ऑफ ऑथर्स की गतिविधियों की मासिक और वार्षिक संक्षेपिका

_*Outstanding academic performance of our institution and cooperation of honourable members.*_


१) सांस्कृतिक :-

दिनांक १० जनवरी २०२६, विशिष्ठ सभा 

सभा के प्रारंभ में हिन्दी दिवस १० जनवरी, युवा दिवस ११, जनवरी, लोहडी १३ जनवरी, मकर संक्रान्ति १४ जनवरी, गणतंत्र दिवस २६ जनवरी के सांस्कृति महत्व और गरिमा का स्मरण करते हुए शुभकामनाएँ प्रसारित की गई।

२) साहित्यिक:-

सोसायटी ऑफ ऑथर्स की लोकप्रिय, लोकमंगलमयी, और उत्कृष्ठ साहित्यिक श्रेष्ठता को देखते हुए आज शहर के तीन प्रबुद्ध साहित्यकारों, श्रीमती मीना अग्रवाल, डॉ. स्वाति सिंह, डॉ. प्रगति जैन, ने संस्था की सदस्यता ग्रहण की। उन्हें धन्यवाद और आभार प्रस्तुत किया गया।  

३) सभा में १० बिन्दुओं का संस्था का संकल्प-पत्र वाचन किया गया।

४) संस्था ने नवाचार के तहत भेंट में सामग्री

के बजाय अवली रचना कारों ने (श्री रामनारायण सोनी, डॉ. अनुपमा जैन, श्री रशीद अहमद शेख ने अपनी अपनी कृतियाँ अतिथि महोदया को उपहार स्वरूप भेंट की।

५) सचिव रामनारायण सोनी ने संस्था की २०२५ की गतिविधियों से सदन को अवगत कराया।

६) श्रेष्ठ उपलब्धि (वार्षिकी) - गत एक केलेंडर वर्ष में -

  अ) ५ अलग अलग गरिमामय कार्यक्रमों मे ५ पुस्तकों का लोकार्पण किया गया। 

  आ) प्रत्येक मासिक सभा में श्रेष्ठ साहित्यकार, समाज सेवी को मुख्य अतिथि के रूप में आमन्त्रित किया गया जिनसे हमारे सदस्य लाभान्वित हुए।

  इ) हर माह में पड़ने वाले तीज-त्यौहार को सांकेतिक रूप से सभा कक्ष में भी मनाया जाता है।

७) कुन्द कुन्द ज्ञानपीठ का आभार, जो हर माह स्थान और सुविधा प्रदान करती है।


    रामनारायण सोनी

    सचिव, सोसायटी ऑफ ऑथर्स, इन्दौर

विशिष्ठ सभा १० जनवरी २०२६

सोसायटी ऑफ ऑथर्स, इन्दौर की विशिष्ठ सभा

सोसायटी ऑफ ऑथर्स की सांस्कृतिक और साहित्यिक विशिष्ठ सभा, दिनांक १० जनवरी को कुन्द कुन्द ज्ञानपीठ में आयोजित की गई। मुख्य अतिथि डॉ. प्रगति जैन शिक्षाविद् एवं लेखिका ने उद्बोधन में कहा कि हमें अपने लेखन में मौलिकता, सार्थकता और समाज की समरसता का विशेष ध्यान रखना चाहिये। युवा पीढ़ी का ध्यान आज संस्कृति, संस्कार, नैतिकता और सामाजिक मेलजोल से हट कर आधुनिक आमोद के संसाधनों की ओर हो गया है। ऐसे में हमारा लेखन का दायित्व और बढ़ गया है। इसलिए आज के मीडिया संसाधन के माध्यम से रचना कर करके अपनी बात उन तक जरूर पहुंचावें। जैसे समद्र की लहरों में चपलता तो होती है पर उसमें समुद्र की आत्मा निवास करती हैं वैसे ही युवाओं को उनको अपनी अस्मिता को पहचानना चाहिये। अपने आसपास देखें तो लेखन के ऐसे विषय रोज मिल जाते हैं। लेखक समाज के लिये क्रान्तदर्शी होता है।
सभा में सुरेश रायकवार, शोभारानी तिवारी, मीना अग्रवाल, आर. डी. गुप्ता, रशीद अहमद शेख, डॉ. पी.के. माथुर, सुनील मुसाफिर, ओमप्रकाश जोशी, बालकराम शाद, डॉ. स्वातिसिंह, रामनारायण सोनी आदि बड़ी संख्या में उपस्थित रचनाकारों ने गीत, गजल, लघुकथा का संदेशपरक एवं सार्थक सरस पाठ किया। कार्यक्रम के अन्त में संस्था की संरक्षक डॉ. अनुपमा जैन ने प्रेरक और रवीन्द्र नारायण पहलवान ने अध्यक्ष्यीय उद्बोधन दिये। 
संस्था सचिव रामनारायण सोनी ने संचालन किया। 
रामनारायण सोनी
सचिव

माह अप्रैल 2026 की विशेष गतिविधियाँ

माह अप्रैल 2026 की विशेष गतिविधियाँ