दिनांक १० जनवरी, २०२६ को कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ में डॉ. स्वाती सिंह ने सत्य घटना पर आधारित एक कहानी पढ़ी जो जिजीविषा से परिपूर्ण थी।
अपने पाठकों और मित्रों को समर्पित
भरत, माँ कैकेई से गुस्से में कहते हैं कि जिसने भी मेरे भैया राम को वनवास भेजा है, मुझे लगता है कि मैं उसका अभी वध कर दूं, पर मां, अगर मैंने ऐसा किया, तो राम भैया मुझे ही त्याग देंगे, इसीलिए मैं चुप हूं ... ।
जब राम वनवास से लौटे, तो सबसे पहले अपनी मां, कैकई के पास गये ... मां कैकेई ने उन्हें भाव विभोर होकर, गले से लगा लिया। ...
आदि आदि न जाने कितने सुंदर सुंदर भाव, अम्मा अपने पेन से कागज पर उकेर रहीं थीं। दरअसल, अम्मा रामायण लिख रहीं थीं, वह भी अपने शब्दों में। अब तक वे बड़े बड़े तीन रजिस्टर भर चुकी थीं और उनकी लिखावट के तो, क्या ही कहने ... ऐसी कि जैसे प्रिंट की गई हो। रोज, पूजा के बाद अम्मा, बिना समय गंवाए रामायण लिखने बैठ जातीं। कभी कभी तो लिखते लिखते सवेरा हो जाता। फ़िर सुबह, मनु के डर से उन्हें सोना पड़ता और जब वे सवेरे देर तक सोतीं, तो मनु चिंता में पड़ जाता और उनके उठने पर पूछता कि क्या हुआ ... तबीयत तो ठीक है न, मां? तो अम्मा बड़े प्यार से हंसकर कहतीं कि बेटा, राम भगवान कल हमसे सुबह चार बजे तक लिखवाते रहे, तो मनु कहता 'सब ठीक है मां, बस अपनी तबियत का ध्यान रखना।' अम्मा की लगन देखकर ऐसा लगता कि वे अपने एक एक अनुभव को कागज पर उतारना चाहतीं हों। जिसके लिए शायद उनके पास समय की कमी के साथ साथ, स्वास्थ्य भी एक चुनौती था। अस्सी साल की उम्र में उन्हें पहले ब्रेस्ट कैंसर और फिर छै महीने के अंदर ही यूटरस के कैंसर का सामना करना पड़ा। पर जब वे ठीक हुईं, तो अकेली पड़ी अम्मा को रामायण लिखने की स्वप्रेरणा मिली। दरअसल मनु की बहू अपने बच्चों और मायके में ज्यादा व्यस्त रहती। फ़िर बाबूजी के बाद अम्मा के पास काम भी तो नहीं रह गया था। अतः उन्होंने रामायण लिखने का सोचा। नाटे से कदवाली, गोरी चिट्टी अम्मा, हमेशा कॉटन की साड़ी, सीधे पल्ले से ढ़ंका हुआ उनका सिर, और चौड़े माथे पर बड़ी लाल बिंदी, जो बाबू जी के बाद भी अपने स्थान पर अटल थी, और उस पर उनका हंसता हुआ चेहरा, उनके वैभव को कई गुना बढ़ा देता। जैसे-जैसे उनकी लिखाई आगे बढ़ रही थी, अम्मा के चेहरे पर एक अजब सा तेज उभर रहा था। हालांकि एक बार फ़िर वे बहुत अधिक बीमार पड़ गईं। जब वे अस्पताल में थीं, तो बिस्तर में लेटे लेटे बस राम-राम करतीं रहतीं। एक दिन मनु से बोलीं 'बेटा अगर हमको कुछ हो जाता है, तो हमारी अधूरी रामायण हमारे साथ ही रख देना, हम उसे पूरी कर देंगे।' मनु को उनकी बात समझ में नहीं आई। वह रोते हुए बोला 'मां आप, रामायण पूरी करेंगी। राम जी आपसे पूरी रामायण सुनना चाहते हैं।' कुछ दिन बाद अम्मा सचमुच में ठीक होकर घर आ गईं और उन्होंने फ़िर आगे लिखना शुरू किया। जब रामायण पूरी हुई, तो मनु ने मंदिर में एक भव्य आयोजन कर, पंडित जी के हाथों रामायण का विमोचन करवाया। बयासी साल की, नई लेखिका - अम्मा, की पहली पुस्तक, सकारात्मक मानस और विश्वास के साथ, आस्था के आचमन और ज़ज़्बे की धुनी से अवतरित - अम्मा की रामायण।
द्वारा: डॉ स्वाति सिंह
असिस्टेंट प्रोफेसर
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