Wednesday, 26 November 2025

शब्दशिल्पी - रशीद अहमद शेख ‘रशीद’

सोसायटी ऑफ ऑथर्स से शब्दशिल्पी


रशीद अहमद शेख ‘रशीद’

********************

सड़क किनारे बेघर निर्धन,
सोते हैं वे भी मानव हैं।
सर्द हवाओं से नित पीड़ित,
होते हैं वे भी मानव हैं।

नहीं पहनते ऊनी कपड़े,
स्वेटर मफलर कोट नहीं हैं।
किसी गर्म जैकेट जर्सी की,
तन पर उनके ओट नहीं हैं।

जिनके बच्चे ठिठुर-ठिठुर कर,
रोते हैं वे भी मानव हैं।
सर्द हवाओं से नित पीड़ित,
होते हैं वे भी मानव हैं।

नहीं भवन या हीटर कोई,
जलते हैं बस कुछ अंगारे।
किसी तरह उष्मा देते हैं,
अपनी काया को बेचारे।

बिना भित्ति की कुटिया में जो,
होते हैं वे भी मानव हैं।
सर्द हवाओं से नित पीड़ित,
होते हैं वे भी मानव हैं।

ठंड बहुत विचलित करती है,
करवट अपनी नित्य बदलते।
किसी समय लगती है झपकी,
रजनी के कुछ ढलते-ढलते।

अधिक समय तक अपनी निद्रा,
खोते हैं वे भी मानव हैं।
सर्द हवाओं से नित पीड़ित,
होते हैं वे भी मानव हैं।

परिचय – रशीद अहमद शेख ‘रशीद’
साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’
जन्मतिथि~ ०१/०४/१९५१
जन्म स्थान ~ महू ज़िला इन्दौर (म•प्र•) भाषा ज्ञान ~ हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत
शिक्षा ~ एम• ए• (हिन्दी और अंग्रेज़ी साहित्य), बी• एससी•, बी• एड•, एलएल•बी•, साहित्य रत्न, कोविद
कार्यक्षेत्र ~ सेवानिवृत प्राचार्य
सामाजिक गतिविधि ~ मार्गदर्शन और प्रेरणा
लेखन विधा ~ कविता,गीत, ग़ज़ल, मुक्तक, दोहे तथा लघुकथा, कहानी, आलेख आदि।
प्रकाशन ~ अब तक लगभग दो दर्जन साझा काव्य संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। पांच काव्य संकलनों का संपादन किया है।
प्राप्त सम्मान-पुरस्कार ~ राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान एवं विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थानों द्वारा अनेकानेक सम्मान व अलंकरण प्राप्त हुए हैं।
विशेष उपलब्धि ~ हिन्दी और अंग्रेजी का राज्य प्रशिक्षक तथा जूनियर रेडक्रास का राष्ट्रीय प्रशिक्षक रहे। सन्रा १९९२ में राज्यपाल से अवार्ड मिला।
लेखनी का उद्देश्य ~ राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता तथा व्यक्तिगत सर्वांगीण विकास।
पसंदीदा हिन्दी लेखक ~ शिवमंगलसिंह सुमन, दुष्यंत कुमार, नीरज
विशेषज्ञता ~ मैं सदैव स्वयं को विद्यार्थी मानता आया हूँ।
देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार ~ भारत से मैं असीम प्रेम करता हूँ। धरती पर ऐसा अद्भुत महान देश अन्यत्र नहीं। मुझे हिन्दी बोलने,पढ़ने और इस भाषा में कुछ भी लिखने में बहुत गर्व का अनुभव होता है।
मौलिकता की शपथ ~ मैं मौलिकता को लेखन का अनिवार्य अंग मानता हूँ।

अखिलेश जैन की कविताएँ

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

1

बाहर हैं 
कोलाहल कितने
जीवन में
संग्राम बहुत हैं,

सांसों के 
कितने झगड़े हैं,
सड़कों पर
भी जाम बहुत हैं,

छांह की
न करो अब बातें,
पेड़ों पर 
इल्जाम बहुत हैं,

विकास के
नहीं दिखते दरवाजे,
नेता जी,
बदनाम बहुत हैं,

आंखों को
न शरम बची है,
कहने को,
सम्मान बहुत हैं,

शब्दों के
अर्थ अनर्थ हैं,
कहने को 
विद्वान बहुत हैं,

चोलों में 
बैठे अपराधी,
कहने को
भगवान बहुत हैं,

बाहर से
दिखते चमकीले,
कालिख के
गोदाम बहुत हैं,

दिखते शरीफ,
जो चेहरे से,
बिकते वो,
ईमान बहुत हैं,

शांति के
बस अब सपने हैं 
तृष्णा के
सामान बहुत हैं,

छोटे से
ये दिल बेचारे,
अखिल इनमें 
अरमान बहुत हैं।

©अखिलेश जैन "अखिल"
२७/११/२०२५

2
मिलता है हर हल,
आज नहीं तो कल,

समस्या मिटेगी पल,
छोड़ चिंता न मचल,

ना रुक तू चलता चल,
ज्यों सतत बहता जल,

करता जा नित्य अमल,
हर लक्ष्य होगा सफल,

न रोकेगा कोई खलल,
बन जा बस कुछ सरल,

बनेगा सपनों का महल,
कर बस अनवरत पहल

©अखिलेश जैन "अखिल"

२६/११/२०२५

स्वरो ज्योति का लोकार्पण

Tuesday, 25 November 2025

 ऑन लाइन लोकार्पण समारोह




व्रजेन्द्र नागर की कविताएँ

      1


देखिये 

नजर अंदाज न कीजिए 

भले ही मौसम धूमिल हो 

आपकी नजरों में बने रहेंगे तो

सुधार होगा स्वभाव 

भले हो अपना

पथभ्रष्ट न हो पाएंगे 

राह अंजानी है 

लक्ष्य पा लेंगे 

चुनाव करना है शांति और 

आतंक के मध्य 

किसी एक का, 

कर पाएंगे 

उतार चढ़ाव तो आते रहते हैं 

जीने में 

उत्साह से उफन कर 

बिखर न पायेंगे 

नजरे सीमा पर होगी परिंदा भी

पर न मार पाएगा

मरने के लिए जीते 

रहेंगे 

जल थल नभ का 

आकलन कर 

सकेंगे 

लोग जीने के लिए मरते हैं 

उत्सर्ग कर देते हैं 

तन अपना 

मौत भी उन्हें महान कह 

नवाजती है 

सूचीबद्ध हो जाएंगे अमर 

श्रेणी के मध्य कहीं न कहीं 


व्रजेंद्र नागर 

251 श्री मंगल नगर इंदौर


          2


 माया का फेर

जन्म लेते ही 

रुलाई आ गयी, ये क्या हो गया 

सुरक्षा में कैसे चूक हो गयी

गर्भ में पूर्ण सुरक्षित निश्चिंत थे 

अंतर्निहित थे 

जन्मते ही माया ने घेर लिया 

अभिशप्त हो गए 

मैं का अर्थ तक नहीं पता था 

मिमियाने लगे 

पुलक कर किलकिलाने 

लगे 

मां के अंक में खुद को सुरक्षित 

समझने लगे 

समय मान अंक से दूर क्या कर

दिया 

अब उठकर चलकर दौड़ भाग 

करने लगे 

ये मेरा है कहकर जिद भी करने 

लगे 

वय ने खेलना सिखा दिया 

मन मर्जी करने लगे 

दौड़ भाग कर साक्षर तो बना 

लिया 

मगर महत्व से दूर थे 

कई अवरोधों का सामना कर 

लक्ष्य तलाशने लगे 

आकलन कर चुनने में शिरकत

बानगी थी 

चुनने की सफलता भी तो 

नाज थी 

चुनते चुनते स्वयं ही चुन लिये

गए 

पता लगा ये कांटों का युक्त 

ताज है 

अनुभव ने समझाया ये 

कनक घट विष से भर पूर है 

पी लिया मगर अनजान थे, महादेव 

ना बन सके 


व्रजेंद्र नागर 

251 श्री मंगल नगर इंदौर

माह अप्रैल 2026 की विशेष गतिविधियाँ

माह अप्रैल 2026 की विशेष गतिविधियाँ