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बाहर हैं
कोलाहल कितने
जीवन में
संग्राम बहुत हैं,
सांसों के
कितने झगड़े हैं,
सड़कों पर
भी जाम बहुत हैं,
छांह की
न करो अब बातें,
पेड़ों पर
इल्जाम बहुत हैं,
विकास के
नहीं दिखते दरवाजे,
नेता जी,
बदनाम बहुत हैं,
आंखों को
न शरम बची है,
कहने को,
सम्मान बहुत हैं,
शब्दों के
अर्थ अनर्थ हैं,
कहने को
विद्वान बहुत हैं,
चोलों में
बैठे अपराधी,
कहने को
भगवान बहुत हैं,
बाहर से
दिखते चमकीले,
कालिख के
गोदाम बहुत हैं,
दिखते शरीफ,
जो चेहरे से,
बिकते वो,
ईमान बहुत हैं,
शांति के
बस अब सपने हैं
तृष्णा के
सामान बहुत हैं,
छोटे से
ये दिल बेचारे,
अखिल इनमें
अरमान बहुत हैं।
©अखिलेश जैन "अखिल"
२७/११/२०२५
2
मिलता है हर हल,आज नहीं तो कल,
समस्या मिटेगी पल,
छोड़ चिंता न मचल,
ना रुक तू चलता चल,
ज्यों सतत बहता जल,
करता जा नित्य अमल,
हर लक्ष्य होगा सफल,
न रोकेगा कोई खलल,
बन जा बस कुछ सरल,
बनेगा सपनों का महल,
कर बस अनवरत पहल
©अखिलेश जैन "अखिल"
२६/११/२०२५
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