Monday, 1 December 2025

चार लाइनों पर समीक्षा


नोट : - यह समीक्षा आज भी मेरी फेसबुक वॉल दिनांक 15 जनवरी 2020 पर मौजूद है।
मैं यह मानता हूँ कि सिर्फ एक दोहे पर रचनाकार अथवा आलोचक अपनी प्रतिभा से सृजन कर सकता है। आलोचना स्वयं एक स्वतन्त्र रचना होती है। इसका विशाल प्राचीर किसी अन्य की एक आधार शिला पर खड़ा खूबसूरत मोनूमेन्ट हो सकता है।

सदाशयता के साथ

रामनारायण सोनी

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समीक्षा ४

भाषा दक्षता : हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत
शिक्षा : एम• ए• (हिन्दी और अंग्रेज़ी साहित्य), बी• एससी•, बी. एड., एल.एल.बी., साहित्य रत्न, कोविद, सेवानिवृत प्राचार्य
लेखन विधाएँ: कविता,गीत, ग़ज़ल, मुक्तक, दोहे तथा लघुकथा, कहानी, आलेख आदि।
लगभग दो दर्जन साझा काव्य संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। पांच काव्य संकलनों का संपादन किया है। सफल मंचीय कवि हैं।

न कोई घर न आंगन है!
न बिस्तर है न आसन है!
सड़क पर नींद में सिकुड़ा,
क़ाग़ज़ों से ढ॔का तन है!

           -रशीद अहमद शेख़ 'रशीद'
कभी शब्द बोलने लगते है, कभी चीखते है, कभी मौन हो जाते हैं, पर कभी कभी वे इतने सहम जाते हैं कि जैसे वे हतप्रभ हों। इन चार लाइनों में "शब्द" यह सब एक साथ करने लग गए हैं।
बड़ा अजीब सा एक नाम है "अनिकेत"। इन चार लाइनो में ये शब्द उस अनिकेत के चतुर्दिक घूमते हैं। इसके शब्दार्थ पर जावें तो अर्थ होगा जिसका कोई घर नही। जिसका घर नही उसका आँगन कैसा? घर नही तो ठौर कैसा? और लोगों को गौर कहाँ?  
जहाँ दाँत हैं वहाँ चने नही और जहाँ चने हैं वहाँ दाँत नही। जहाँ दोनों हैं वहाँ भूख नहीं। महँगे पर्दों और सीसों लगी ऊँची अट्टालिकाओं से सड़क पर सोते हुए बचपन को क्या कोई देख नहीं रहा होगा? सड़क से गुजरने वाली मोरिस और डस्टर की गद्देदार सीटों पर बैठ कर फर्राटे मे गुजर जाने वाले सक्ष को इस ओढ़े हुए अखबार के फड़फड़ाने की आवाज महसूस नही हो रही होगी? यह एक अनकही और अबूझ कथा का रोमांचक सत्य है। 
मजदूर अपने पसीने से कच्ची जमीन पर पक्की सड़क बनाता है लेकिन उस पर फिर कभी चल नहीं पाता है। वह फिर एक और कच्ची जमीन की ओर चल पड़ता है नई सड़क बनाने के लिये। जब उसकी कुदाल चलती है तो पास ही ऐसा एक बचपन सोता रहता है। कहीं और जा कर वह नीव खोदता है, भव्य मकान बनाता है, मकान पूरा होते ही एक नई नीव खोदने चल पड़ता है, वहाँ वह कभी नहीं रह पाता है; तब भी एक ऐसा ही बचपन पास की सडक़ पर सोता रहता है। शायद तब भी कोई खिड़की उसे मजे में संवेदनहीन हो कर देखती रहती होगी। उस खिड़की ने देखा हो कि न देखा हो पर एक संवेदनशील कवि की आत्मा इस दृष्य का मौन निरीक्षण करती रहती है। सर्दी में बचपन सिकुड़ता है पर उसे देख कवि का मन ठिठुरने लगता है। तब जन्म लेती है एक थोड़े से शब्दों में गम्भीर व्यथा कथा वाली कविता। इसे कोई वैषम्य कहता है, कोई दरिद्रता या कोई प्रारब्ध कह कर आगे बढ़ जाता है। 
यहाँ इन सब से परे कवि की चिन्ता इस बचपन की है जिसका चिन्तन इन शब्दों के माध्यम से उजागर हो रहा है। वह इस पचड़े में पड़ना नहीं चाहता कि इस पहेली का उत्तर क्या है? लेकिन वह संकेत करता है कि कोई इस भविष्य के आदमी के भविष्य को बचा ले। 

रामनारायण सोनी


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