आज के सृजन में
श्री व्रजेन्द्र नागर एवं श्री अखिलेश जैन
१
वनवासी तपते हैं या तपाये
जाते
प्रकृति से ओत: प्रोत हैं सरल
प्रताड़े जाते
मानव स्वभाव है व प्रकृति भी
है उसकी
भवन सृजन के पूर्व गड्ढे बहुत
खोदे जाते
आधार जीवन का कैसा है नहीं
जानते
सिर्फ कंगूरे पर फड़फड़ा कर
गुटर्गू करते
आनंद पाने के पूर्व ही उठाते हैं
जोखिम
हिम का अंत होने पर ही बाहर
भी है आती
बहार की चाहत में भी गर्त व
शिखर को तलाशते
गर्मी के मौसम में ठंडक पाने
जल के निकट जाते
क्रोध करते हैं खुद शांति को पाने
के लिए
न जाने क्यों जीवन के लिए मौत
हैं चाहते
२
सफलता का चरम
सफलता यूं ही नहीं मिलती बीज को
मिट्टी में दबना होता है
अंकुरण के साथ ही विकसित हो लंबी
प्रतीक्षा करता है
लालिमा से हरितिमा पाकर पल्लवित
होता है
समय पाकर गुम्फित भी होता है कली
का स्पंदन जीवन्त होता है
विस्तार पाकर सुमन ही सुरभित दुनिया
करता है
प्रकृति सुमन पाकर फलवती हो जाती
शिखर जाती है
साधना और तप से ही फल परिपक्व हो
रस देता है
सफलता पाने के बाद वह न अवरुद्ध
कभी होता है
बड़ी यातनाएं सहकर ही रस संवर्धन
करता है
इस पर भी लोग चखकर अनुभूति ही
बताते हैं
जैसी प्रकृति है वैसा ही फल मधुरिम या
कटु होता है
सफलता पाते ही दिल सागर सा उदात्त
लहराता है
उद्भट और उत्तंग लहरें उठ कर गर्जन
व तर्जन करती रहती है
सागर सा विशाल हृदय उन्हें शीतल
कर देता है
हृदय का उथला पन कभी भीसंरक्षण
न देता है
व्रजेंद्र नागर
251 श्री मंगल नगर इंदौर
[07/12/2025, 1:10 pm] Akhilesh Jain SAI: 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
न कर बयां,
दर्द उधार का
न पता तुझे
दर्द है, कहां
न है हर दर्द की
दवा यहां,
देख भर के
एक नज़र जहान,
हर शख्स है,
परेशान यहां,
छोड़ दे
किस्सा हार का,
गा गीत,
बहार का,
किस ने देखा,
वो पल,
जी ले आज,
कौन सा कल?
न कर बयां
दर्द उधार का
देख अपना,
छोड़ संसार का,
©अखिलेश जैन "अखिल"
७
"भारत बने प्रमाण"
सोने वाले जाग जरा,
अरुण किरण ले आग,
स्वप्न देखे जो निंद्रा में
हो कर्मरत कर साकार,
आराधन कर आराध्य,
कर नित ग्रह,देव याग
जग को दे,संभव भाग,
अकिंचन न रहे समाज,
आदि से अनंत प्रकृति,
कर सब उचित विचार,
शुभारंभ कर जीवन में
षड रिपु का कर त्याग,
संग संग का कर संगठन
एकजुट हो सब परिवार
संकल्पों संग सुसज्ज हो
कर दनुज शक्ति संहार,
दिव्य बनें अखिल मनुज
हो देवगुण सकल व्याप्त
राज काज धर्म नीति का
भारत बने सहर्ष प्रमाण
©अखिलेश जैन "अखिल"
८/१२/२०२५
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